Friday, June 14, 2024
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    कार्बन डेटिंग विधि से आखिर कैसे चलता है उम्र का पता, जानें –

    ज्ञानवापी प्रकरण में आज का दिन बहुत अहम होने वाला है। न्यायालय ने ज्ञानवापी परिसर के वजुखाने में स्थित कथित शिवलिंग की कार्बन डेटिंग कराने के अपील पर निर्णय लेगी। कोर्ट अपना निर्णय दोपहर 2 बजे के पश्चात दे सकती है, जिसका इंतजार बेसब्री से दोनों समुदाय के लोगों को है। तो आपके मन में सवाल होगा कि ये कार्बन डेटिंग है क्या? कैसे काम करता है? तो आइये जानते हैं।

    कार्बन डेटिंग की विधि से विशेषज्ञ किसी वस्तु की वास्तविक आयु का अंदाजा लगाते हैं। जो बहुत पुरानी है। कार्बन डेटिंग के माध्यम से विशेषज्ञ चारकोल, बीज, हड्डी, चमड़े, बाल, लकड़ी, बीजाणु, पराग, फर, सींग और रक्त अवशेष, पत्थर व मिट्टी से भी उस वस्तु के लगभग सटीक आयु को जान सकते हैं। यह पद्धति ऐसी हर उस चीज जिसके अवशेषों में  कार्बनिक अंश होते हैं, जैसे शैल, कोरल, बर्तन से लेकर दीवार की चित्रकारी की आयु भी कार्बन डेटिंग से पता लगाया जा सकता है।  

    होता ये है की हमारे परिवेश में कार्बन के 3 आइसोटोप कार्बन-12, कार्बन-13 और कार्बन-14 उपस्थित होते हैं। और कार्बन डेटिंग विधि में कार्बन-12 और कार्बन-14 के बीच का अनुपात निकाल कर गणना की जाती है। जब किसी जीव की मृत्यु हो जाती है, तब मृत शरीर का वातावरण से कार्बन का आदान-प्रदान भी समाप्त हो जाता है। अत: जब जीव मरते हैं, तो उनमें उपस्थित कार्बन-12 से कार्बन-14 के अनुपात में परिवर्तन आने लगता है। इस परिवर्तन की गणना करने के पश्चात ही जीव की अनुमानित आयु की जानकारी प्राप्त की जाती है।

    इसका कारण है की कार्बन-12 स्थिर यानी इसकी मात्रा घटती-बढ़ती नहीं है। वहीं कार्बन-14 रेडियोएक्टिव होने के कारण इसकी मात्रा घटने लगती है। और इसी गुण से पता किया जाता है बता दें की कार्बन-14 लगभग 5,730 सालों में अपनी वास्तविक मात्रा का आधा हो जाता है। इसे वैज्ञानिकों की भाषा में हाफ-लाइफ कहा जाता है। किसी स्थान पर एक चट्टान कब से है, यह कार्बन डेटिंग की अप्रत्यक्ष विधियों का प्रयोग कर करके समय निर्धारित करना भी संभव है। अगर चट्टान के नीचे दबे कार्बनिक पदार्थ अर्थात मृत जीव के कर्बन डेटिंग करके इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि वो चट्टान वहां कब से है।

    शिकागो यूनिवर्सिटी के विलियर्ड लिबी और उनके साथियों ने सन 1949 में रेडियो कार्बन डेटिंग पद्धति का आविष्कार किया था। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए उन्हें 1960 में रसायन का नोबेल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।  उन्होंने कार्बन डेटिंग से सर्वप्रथम लकड़ी की आयु का पता लगाया था। और इसे एब्सोल्यूट डेटिंग नाम से भी जानते हैं। परन्तु, वैज्ञानिकों का कहना है की यह पद्धति केवल अनुमानित आयु की ही जानकारी दे सकती है।

    हालांकि, कार्बन डेटिंग विधि की कुछ अपनी सीमाएं भी हैं। इस विधि का प्रयोग कर टेराकोटा की मूर्ति के आयु का अंदाजा लगाना संभव नहीं है। और न ही इस विधि की मदद से किसी धातु की आयु ज्ञात करना संभव है।  

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